।।श्रीगणेशाय नमः।।
श्रीमत्कल्याणवर्मसूरिविरचिता
सारावली

पञ्चाशोऽध्याय:
(नववर्गगुणचिन्ताध्याय:)

अतोंऽशके (गतेति)लग्नगते तु वक्ष्ये वर्णस्वभावाकृतिलक्षणानि।

प्रधानवीर्येंऽशपतौ शशीव तत्स्वामिराशिक्रमशो विधत्ते।।1।।

अजसंस्थानमुख: स्यान्मेषाद्यांशेऽल्पनासिकांगभुज:(रुह:)

चण्डध्वनिर्विरूप: संकुचिताक्ष: कृशोऽक्षताङ्गश्च।।2।।

श्यामगुरुस्कन्धभुजो ह्रस्वललाट: सुजत्रुक: स्फुटदृक्।

दीर्घास्यनसो मृदुवाक्तृतीयभागे कृशाङ्घ्रिसन्धिश्च।।3।।

व्यालुप्तकेशगौरो व्यस्तभुजश्चारुनयननासश्च।

वाक्पण्डितस्तृतीये जातस्तु कृशोरुजानुजंघश्च।।4।।

विभ्रान्तदृक्प्रचण्डो ह्रस्वनसोऽटनखराङ्घ्रिरोमा च।

अभ्रातृक: कृश: स्याच्चतुर्थनवभागज: पुरुष:।।5।।

दृप्तो गजेन्द्रनयन: पृथुनासाभ्रललाटको मध्ये।

पीनोपचिताग्रतनु(ततो) खरतररोमाङ्घ्रितनुकेश:।।6।।

श्यामो मृदुर्मृगाक्षो गुरु: कृशस्फिक्कठोरुचरण: स्यात्।

व्यस्तोदरकभुजांस: षण्ढो भीरुश्च बहुभाषी।।7।।

दूर्वाङ्कुराभचपल: सितनेत्र: सप्तमे भवेत्पुरुष:।

कुलटापतिर्नृशंसो विशालविस्तीर्णमूर्ति: स्यात्।।8।।

वानरमुखप्रवक्ता खरपिङ्गतनुश्च गुह्यगद:।

हिंस्त्रोऽनृतपापरत: सुहृत्प्रियोग्र: सदाष्टमज:।।9।।

दीर्घ: कृशो विहारी व्यस्तललाटश्रवोऽश्ववदनश्च।

बह्वभिधानाभिरतस्त्वनृजुर्नवमांशजो भवति।।10।।

समकृष्णतनु: स्तब्ध: पूर्वमघान्त्येऽन्त्यकर्मा स्यात्।

नीच: प्रकृतिविरुद्धो विषमाक्षिनिरीक्षणो वृषस्याद्ये।।11।।

गम्भीरदृगलसात्मा विनतशिरावक्त्रकश्च लघुमेधा:।

प्रतिकूलकर्ममिथ्याबहुप्रलापी द्वितीये स्यात्।।12।।

मृद्वङ्गवान्व्मुष्मान्सुनसस्पष्टायताक्षबृहदङ्ग:।

यज्ञादिकर्मनिरत: स्थिरपार्ष्णिकरस्तृतीयनवमांशे।।13।।

ह्रस्वोदर: सुरोषो मेषाक्ष: पिङ्गलस्त्वधनयुक्त:।

परधनहरणाभिरतश्चतुर्थभागे वृषस्य नर:।।14।।

व्याल: सुतुङ्गघोणो महर्षभाकारवक्त्रघनकेश:।

स्यात्पञ्चमे विलासी बृहद्भुजस्कन्धकटिगौर:।।15।।

स्वक्ष: स्थिर: सुकेश: स्निग्धतनुर्वल्गुवाक्प्रगल्भ: स्यात्।

माधुर्यहास्यनिरत: कृश: सुनिपुणो भवेत्ष्ष्ठे।।16।।

मृतसुतयुवतीषु रतो मनाक्प्रलम्बाग्रनासिकाक्ष: स्यात्।

उद्बद्धांग: स्वजनद्वोषी गुरुपादसूक्ष्मकेशश्यच।।17।।

व्याघ्रेक्षण: सुदशनस्त्वचितस्फुटनासिकोऽल्पकर्मा स्यात्।

उद्वृत्तनीलकेशोग्रनखो मुखरस्तथाष्टमज:।।18।।

मान्योऽल्पसत्त्वभीरु: क्रोधी समरुचिरमूर्तिकितव: स्यात्।

सञ्चितधन: प्रसिद्ध: कृशस्त्वधस्तात्प्रलाप्यन्ते।।19।।

रोमोपचितांसभुजे घनासितापांगदृक्तथोच्चनस:।

दूर्वाकाझडश्याम: कृशाङ्घ्रिपाणिस्तृतीयभवनाद्ये।।20।।

घटशीर्षोऽशुचिकर्मा घातरुचिर्मध्यलग्नघोण: स्यात्।

बहुभाषी बहुचेष्टो द्वितीयभागे तु विग्रहाधिपति:।।21।।

गौरोऽतिरक्तनयन: सुनासिक: समतनु: सुमेधा स्यात्।

दीर्घाननोऽसितभ्रूर्वाचा चतुरस्तृतीयेंऽशे।।22।।

सुभ्रुललाटकामी नीलोत्पलमूर्तिर्विपुलवक्षा: स्यात्।

सितदन्तो(वक्त्रो) मृदुवक्त्र(वक्रं) प्रशस्तरोमाचितश्चतुर्थेऽशे।।23।।

पृथ्वाननो बृहत्स्फिक्पीवरवक्षोभुजश्च खल:।

स्थूलशिरा मायावी सितानुकूलेक्षणस्तु पञ्चमज:।।24।।

मध्वीक्षण: प्रलापी व्यस्तललाट: समस्सुतनु:।

कितवश्चलश्च रुचिरोष्ठरद: षष्ठे तु सत्त्वयुत:।।25।।

ताम्रारुणाक्षवर्ण: समुन्नताक्षो विशालवक्षा स्यात्।

शिक्षास्त्रशिल्पनिपुण हास्यरति: सप्तमे जात:।।26।।

श्यामो गुरुर्मनस्वी ललितो मधुराभिधानश्च।

व्यस्तविवृन्शरीरो दीर्घासितदृक्कलाविदष्टमज:।।27।।

वृत्तासितदृक्सुतनु: सिद्धो मेधाबलो रतिज्ञ: स्यात्।

विज्ञानकाव्यनिरतो नवमे जायेत मिथुनस्य।।28।।

निर्मलचारुसुगौर: सुमूर्धज: स्याद्विशालकुक्षिश्च।

मंगलमुखोन्नताक्षस्तन्वंगभुज: कुलीराद्ये।।29।।

(छविचरणोढ:)रक्तच्छवीरणोग्र: कलाप्रिय: स्याद्विडालमुखनेत्र:।

कर्किद्वितीयभागे त्यागी कृशजानुजंघश्च।।30।।

गौर: सुनेत्रवाग्मी सुकुमारस्थूलयोषिदंगश्च।

धीमान्मृदुकर्मरतस्तृतीयभागे भवेदलस:।।31।।

श्यामच्छविर्नतभ्रूर्विशालपीनोन्नत: सुनासाक्ष:।

क्षीण: पुरुषो दाता स्वजातिकार्यश्चतुर्थे स्यात्।।32।।

घण्टास्वरो नतास्य: सुसंहतभ्रू: सुदीर्धबाहु: स्यात्।

सेवारतो विकर्मा मध्ये दुर्मर्षणोऽल्पमेधाश्च।।33।।

दीर्घविशालशरीर: प्रशस्तनयनो बहुप्रताप: स्यात्।

गौर: सुवंशघोणो वक्ता षष्ठे च पृथुदन्त:।।34।।

भिन्नशिरोरुहरोमा वृहत्तनु: स्यात्सिरालजङ्घश्च।

परगृहरक्षणशील: काकाकारश्च सप्तमज:।।35।।

घण्टाशिरा: कुशिल्पी सुमुखभुजांगश्च कूर्मगति:।

मध्यविलग्ननस: स्यादष्टभागे तु कुष्ठश्च।।36।।

गौरो झषनेत्रगुरुर्मृदूदरोऽथ पृथुपीनवक्षा: स्यात्।

दीर्घहनुर्लम्बोष्ठो महोरुकृशजानुगुल्फोऽन्त्ये।।37।।

मन्दोदर: प्रचण्डो रक्ताग्रनसो बृहच्छिरा: शूर:।

उन्नतमांसलवक्षा: सिंहे प्रथमे भवेद्भागे।।38।।

उन्नतविततललाटश्चतुरस्त्रतनुर्विलोमनेत्रश्च।

दीर्घभुजोन्नतवक्षा: पृथुग्रघोणो द्वितीयेंऽशे।।39।।

रोमान्वितायतभुजश्चकोरनयनस्तलस्त्यागी।

उन्नासिकस्तृतीये स्निग्धतनुर्बाहुवृत्तगल:।।40।।

घृतमण्डगौरगात्रो दीर्घासितलोचनो मृदुशिरोज:।

भिन्नध्वनिश्चतुर्थे पृथुकरचरणश्च भेककुक्षि: स्यात्।।41।।

घण्टाशिरोऽल्पकोशो सितघोणाक्षश्च लोमशांगतनु:।

लम्बोदरप्रचण्डो दंष्ट्रोत्कटपीनहृन्मध्ये।।42।।

स्त्रस्ताल्परोममूर्ति: स्निग्धसमासितविलोचनो दीर्घ:।

श्याम: सत्रीणां चतुरो विकत्थनो वाक्यपण्डित: षष्ठे।।43।।

दीर्घानन: ‍सिराल: पीनतनु: स्त्रीषु दुर्भग: कृष्ण:।

स्यात्सप्तमे सुचण्डो रोमचित: कूटनिष्ठुराभाषी।।44।।

उत्कृष्टवाक्स्थिरांग: (सूभ्रूर्ग)सुभगो गम्भरीदृग्विकर्मा च।

नि:स्व: कूटकर: स्यादष्टमभागे प्रसूतश्च।।45।।

रासभमुखोऽसिताक्षो व्यालम्बभुज: सुपार्ष्णिजङ्घश्च।

श्वासनिपीडितवक्षा नवमांशे जायते मनुज:।।46।।

सारंगाक्षो वक्ता प्रदानसम्भोगवान्धनाढ्यश्च।

श्यामोन्नतहृदय: स्यात्षष्ठे प्रथमांशके जात:।।47।।

पूर्णानन: (वक्षा)सुचक्षु: (पिशुन: कलहप्रिय: सुगूढवया:)स्निग्धो मृदुवादशीलश्च।

लम्बोदरश्चल: स्याद्द्वितीयभागे महोरुश्च।।48।।

स्फुटनासिकापुट: स्यात्प्रशस्तपादश्च पीनपादभुज:(पाणि)

विस्पष्टवाक्च गौर: कन्यासु सुहृत्तृतीयेंऽशे।।49।।

श्रुतवान्स्त्रीषु च रमते सुकुमारो मधुररक्तगौरश्च।

तीक्ष्णश्चतुर्थभागे प्रबोधनोऽध:कृशो द्वितूर्धा च।।50।।

स्थूलोष्ठबाहुरुन्नततनु: पृथुशिरोरुहांस: स्यात्।

पञ्चमज: पृथुवक्षा पराश्रयोद्बद्धजंघश्च।।51।।

स्निग्धच्छवि: सुवाक्य: शस्ततनु: शास्त्रकृतमतिप्रचुर:।

लिपिलेख्यकलाभिज्ञ: सुमना: षष्ठांशजी विहारी च।।52।।

ह्रस्ववदनोन्नतांस: स्निग्धभुजोन्तेऽन्ते च केशगौर: स्यात्।

सप्तमज: पृथुजठर: पृथुतरचरणोऽम्बुभीरुश्च।।53।।

सुकुमारगौरदीर्घश्चि त्रोन्नतदृक्प्रचण्डमानी स्यात्।

व्यालम्बपीनबाहु: पिंगलरोमाष्टमे जात:।।54।।

ख्यातो मृदुसुखमूर्तिर्विशालनेत्रो बलासदृशत्त्व:।

चतुरो नवमेंऽशे स्यान्नतांसलेख्यादिविद्वांश्च।।55।।

गौरो विशालनेत्र: श्लाघी दीर्घाननोऽर्थगोप्ता स्यात्।

नवपण्यकर्मकुशलस्तुलाधराद्यशज: सुविख्यात:।।56।।

प्लुतमण्डलनेत्र: स्यात्करालदन्तो निमग्नमध्यस्तु।

युगले विस्तृतहृदय: कुतनुर्घनसंहतभ्रूश्च।।57।।

गौरोऽश्वमुख: सुरदो महोन्नताक्ष: कृशोऽपि लब्धयशा:।

दीर्घकरोरुहघोणस्तृतीयज: स्यात्सुचरणश्च।।58।।

तन्वंसबाहुभीरुस्तून्नतदन्त: कृशो मृगतरलदृक्।

ह्रस्वनस: सुविषादी श्यामो शीलश्चतुर्थजो भवति।।59।।

गम्भीरदृक्स्थिरात्मा सुहृत्प्रिय: पंचमे ह्यमानी स्यात्।

खरकेश: समनेत्रो मध्यप्रतिलग्नघोणदृप्तश्च।।60।।

पीनाङ्गो गौर: स्याद्विशालनेत्र: सुनासिकावंश:।

स्निग्धनख: सुतयज्ञ: षष्ठेंऽशे शास्त्रविज्जात:।।61।।

रक्तावदातम(रति)तिमान्गुरुह्रस्वतनु: कृशो ललाटे स्यात्।

लुब्ध: प्रचण्डदुर्ग: सप्तमभागे मनस्वी च।।62।।

तुङ्गांसगण्डभोक्ता कठिनतनुर्दीर्घकृष्णभ्रू:।

निर्णिक्तवाक्प्रशान्त: सद्वक्षस्त्वर्धमस्तकोऽष्टमज:।।63।।

स्वक्ष: प्रसन्नगौर: समचारुतनु: पटु: कलाभिरत:।

दाक्षिण्यहास्यनिरतो विटस्वभावो भवेन्नवमे।।64।।

ह्रस्वोन्नतौष्ठघोण: सुललाट: स्याद्दृढाङ्गौरश्च।

दर्दुरकुक्षिर्धटकोऽष्टमराशौ प्रथमनवभागे।।65।।

गौर: पृथ्वायतहृद्बाहुस्ताम्रोग्रदृग्द्वितीये स्यात्।

उद्वृत्तबलनिहन्ता साहसकृदनल्पकेशश्च।।66।।

प्राज्ञो दृढांसबाहु: प्रयत्नकोशो विशुद्धवाक्य: स्यात्।

कानीनको वपुष्मान्गौरो रुचिराधरस्तृतीयेंऽशे।।67।।

परदारद्रोहरति: क्षेप्ता धीरश्चतुर्थजो दीर्घ:।

श्यामोऽसितकेशाक्षो नट: प्रगल्भश्च पीनरोमांस:।।68।।

गम्भीरस्ताम्राक्षो मग्ननस: पञ्चमे धीर:।

मृष्टोदरोग्रकर्मा व्यस्तदृढाङ्गो यशस्वी स्यात्।।69।।

धृष्टो वरिष्ठबुद्धि: पृष्ठोच्चनसो गम्भीरसत्त्व: स्यात्।

सुनय: प्रचण्डकर्मा षष्ठे दक्षोऽल्पकचधनभ्रूश्च।।70।।

दारितमुख: स्थिराङ्ग: प्रविकीर्णरद: शिरावनद्धाङ्ग:।

निम्नोदर: प्लुताक्ष: स्त्रस्ततनु: सप्तमे भवेदंशे।।71।।

स्फुटिताग्रनस: कालो विपन्नशीलो मलीमसाङ्ग: स्यात्।

भिन्नोत्कटै: शिरोजै: सन्त्यक्तमतिस्तथाष्टमज:।।72।।

गौरो मृगाकृतिमृदु: प्रशान्तपिङ्गाक्षरोमदृढपीन:।

सुसमेतश्च गुरूणां मत: प्रजातो नवमभागे।।73।।

सुबृहन्नसोजदृष्टि: स्फुटाग्रभाषी सुदन्तरोमा च।

गौर: सुबद्धवृषणश्चापाद्यांशे प्रचण्ड: स्यात्।।74।।

प्रोत्तुङ्गशिरा: स्थिरविद्विस्तीर्णाक्षो गुरुस्फिगूरुश्च।

विकृताग्रनसो दीर्घो महाहनु: स्याद्द्वितीयेंऽशे।।75।।

शिक्षाशास्त्रमतिज्ञ: प्रगल्भगम्भीरमूर्तिसुनयश्च।

स्त्रीवल्लभो मनस्वी तृतीयजो हास्यशिल्पज्ञ:।।76।।

दक्षो मधुमण्डलदृग्गौर: कच्छपविवृद्धकुक्षिश्च।

प्राज्ञो नट: सुकेश: पृथुशुभमूर्तिश्चतुर्थ: स्यात्।।77।।

पृथुकर्णनेत्रवदन: प्रबद्धहरिविग्रहो महाभ्रू: स्यात्। 

पीनोन्नतांसहन्ता पञ्चमजो गूढरोमदृढबुद्धि:।।78।।

स्निग्धासितान्तपृथुदृक् महाललाट: सुमूर्तिकाव्यरत:।

पृथुपीनमुखो हीन: षष्ठे विद्वात्कथ: सुधन:।।79।।

श्यामो मृदुर्वचस्वी तुंगशिरा: सङ्ग्रहानुसन्धिरत:।

दीर्घो विशालनयनो दाक्षिण्य चण्डश्च सप्तमज:।।80।।

चिपिटाग्रनासिक: स्याद्विस्तीर्णशिरा: सुबद्धवैरश्च।

विभ्रान्तदृक्प्रलापी(भाषी) गुरुष्वभिमतोऽष्टमांशभव:।।81।।

गौरो हयाकृतिमुखो दीर्घासितदृक् तथाल्पवाक्य: स्यात्।

सत्य: सतां विषादी नवमे कुटिलोरुजंघश्च।।82।।

विरलाग्ररद: श्याम: प्रभिन्नवाक्योऽशिरोर्जा वरनास:।

गीताध्वहास्यनिरतो मकराद्ये चलधन: कृशांग: स्यात्।।83।।

अलसश: कुटिलनसो गीताभिरतिर्विशालदेहश्च।

प्रचुरांगनासु निरतो बहुभाषी स्याद्द्वितीयज: कल्प्य:।।84।।

गान्धर्वकलाकाम: ख्यातांगो गौरदृक्सुमनस:।

बहुमित्रबन्धुरतिमांस्तृतीयज: स्विष्टकर्मा च।।85।।

रक्तासितवृत्ताक्षो महाललाटभुजदुर्बलांगकर:।

भवति हि विकीर्णकेशश्चतुर्थजो विरलदन्तवाक्य: स्यात।।86।

उद्गण्डघोणकुक्षिर्भवति हि भोक्ता सुनासिकावंश:।

श्यामो वृत्तोरुभुज: पञ्चमभागे स्थिरारम्भ:।।87।।

स्निग्धच्छवि: सुवेष: कामरत: सूक्ष्मसमरदसुवक्ता।

षष्ठांशज: पृथुहनुर्महाललाट: पुमान्भवति।।88।।

श्यामोऽलस: सुभाषी कु(रूक्षित)ञ्चितकेशो बृहत्तनु: कठिन:।

मृदुपादपाणिमतिमान्सप्तमज: शीलसम्पन्न:।।89।।

गम्भीरदृक्सुघोण रक्तास्यो भिन्ननखशिरोज: स्यात्।

उद्बद्धतनु: शक्तोऽष्टमजो घटपृथुललाटश्च।।90।।

विपुलाक्षिहृत्सुमेधा: पूर्णमुखो गीतवाद्यनिरतश्च।

माधुर्यसत्त्वयुक्त: साधुर्नवमे भवेत्सुजन:।।91।।

श्यामो मृदुः कृशांगः पीनहनुः शास्त्रकाव्यमतिः।

कामी रतिमान्कान्तः कुम्भस्याद्यांशके भवेज्जातः।।92।।

त्वङ्नखदृष्टिशिरोजै: खरैश्च सुविपन्नवत्सल: साधु:।

दीर्घो त्रिशिरा मूर्खो द्वितीयभागे भवेज्जात:।।93।।

संसक्ततनु: प्रमदाप्रियश्च वैदूर्यकान्तिधर:।

शास्त्रार्थवित्प्रयोक्ता तृतीयनवभागसंजात:।।94।।

कान्तानुरतो गौरो विदारितास्यो रिपुप्रणाशकर:।

गम्भीरधीरसत्त्वश्चतुर्थजो भोगरतियुक्त:।।95।।

स्पष्टार्थवित्कलाज्ञ: खररोमधराङ्ध्रिरुग्र: स्यात्।

संरुद्धगण्डकर्ण: पञ्चमज: कृष्णवर्णश्च।।96।।

व्याघ्रानन: प्रगल्भ: कुञ्चितकेश: सुनिश्चितार्थश्च।

व्यालमृगोरगहन्ता षष्ठेंऽशे वल्लभो नृपते:।।97।।

मेषाक्षिमुखस्तीक्ष्णो ग्राम्यरति: स्त्रीषु परिभूत:।

पित्तरुगर्दितदेह: सप्तमज: सत्त्वधृतियुक्त:।।98।।

स्थिरसत्त्वबुद्धिरतिमान्नरेन्द्रयोधो नरेश्वर: सुभग:।

स्थूलरदो विपुलाक्ष: कुम्भे स्यादष्टमेंऽशके पुरुष:।।99।।

श्याम: सम(वदनो)ग्रदशनो विशेषित: सुधनदारपुत्रश्च।

नवमांशज: सुवाक्य प्रथित: शक्तो भवेत्पुरुष:।।100।।

गौरोऽपि रक्तदेह: प्रभामृदुस्त्रीमतिप्रचलचित्त:।

ह्रस्वगल: कृशमध्यो मीनस्याद्यांशके पुरुष:।।101।।

(पृथुपीनमुग्रनास:)पृथुपीनभग्ननास: क्रियापटुर्मांसभुग्रुचिरदेह:।

काननपर्वतचारी बृहच्छिरा: स्याद्द्वितीयांशे।।102।।

गौर: शठ: सुचक्षु: शस्ततनुर्धर्मवान्सुविद्वांश्च।

दाक्षिण्यवान्विनीतस्तृतीयजो रूपवांश्चतुर:।।103।।

गुणवान्विपन्नशील: प्रवृद्धसेवी क्रिया(पटुर्वीर:)पटुर्विद्वान्।

सत्त्वाधिको नयज्ञस्तुङ्गस: स्याच्चतुर्थे तु।।104।।

दीर्घोऽसित: प्रतापी तुङ्गाङ्ग: स्वल्पनासिक: स्वक्ष:।

हिंसारति: शुभरदो दुष्प्रसह: पञ्चमे प्रलापी स्यात्।।105।।

कान्त: प्रतापगुणवान्प्रसन्नवंशोऽल्पनासिको मादी

तिर्यग्वदन: ख्यात: षष्ठेंऽशे स्यात्तथा निपुण:।।106।।

पुरुषाभिमानपरकृद्धर्मरुचि: श्रेष्ठकश्च सचिव: स्यात्।

प्रबलो विषदशील: (शठ:)शठोऽस्थिर: सप्तमे भागे।।107।।

दीर्घो बृहच्छिरा: स्यात्कृशोऽलसो रूक्षनेत्रकेशश्च।

मन्दात्मजोऽर्थनिरतो रणकुशलो ह्यष्टमे भागे।।108।।

ह्रस्वो मृदु: सुधीरो विशालवक्षोक्षिनासिक: स्निग्ध:।

(वित)विहिताङ्गबुद्धिगुणवान्नमेंऽशे स्यात्पुमान्ख्यात:।।109।।

यत्प्रोक्तं(प्रोक्तामशादि) राशिफलं द्वादशभागेऽपि तत्फलं वाच्यम्।

सप्तमभागसमानं शेषेषु विनिर्दिशेत्प्राज्ञ:।।110।।

इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां नष्टजातकाध्याये नववर्गगुणचिन्ता नाम पञ्चाशोऽध्यायः।।