अतोंऽशके (गतेति)लग्नगते तु वक्ष्ये वर्णस्वभावाकृतिलक्षणानि।
प्रधानवीर्येंऽशपतौ शशीव तत्स्वामिराशिक्रमशो विधत्ते।।1।।
अजसंस्थानमुख: स्यान्मेषाद्यांशेऽल्पनासिकांगभुज:(रुह:)।
चण्डध्वनिर्विरूप: संकुचिताक्ष: कृशोऽक्षताङ्गश्च।।2।।
श्यामगुरुस्कन्धभुजो ह्रस्वललाट: सुजत्रुक: स्फुटदृक्।
दीर्घास्यनसो मृदुवाक्तृतीयभागे कृशाङ्घ्रिसन्धिश्च।।3।।
व्यालुप्तकेशगौरो व्यस्तभुजश्चारुनयननासश्च।
वाक्पण्डितस्तृतीये जातस्तु कृशोरुजानुजंघश्च।।4।।
विभ्रान्तदृक्प्रचण्डो ह्रस्वनसोऽटनखराङ्घ्रिरोमा च।
अभ्रातृक: कृश: स्याच्चतुर्थनवभागज: पुरुष:।।5।।
दृप्तो गजेन्द्रनयन: पृथुनासाभ्रूललाटको मध्ये।
पीनोपचिताग्रतनु(ततो) खरतररोमाङ्घ्रितनुकेश:।।6।।
श्यामो मृदुर्मृगाक्षो गुरु: कृशस्फिक्कठोरुचरण: स्यात्।
व्यस्तोदरकभुजांस: षण्ढो भीरुश्च बहुभाषी।।7।।
दूर्वाङ्कुराभचपल: सितनेत्र: सप्तमे भवेत्पुरुष:।
कुलटापतिर्नृशंसो विशालविस्तीर्णमूर्ति: स्यात्।।8।।
वानरमुखप्रवक्ता खरपिङ्गतनुश्च गुह्यगद:।
हिंस्त्रोऽनृतपापरत: सुहृत्प्रियोग्र: सदाष्टमज:।।9।।
दीर्घ: कृशो विहारी व्यस्तललाटश्रवोऽश्ववदनश्च।
बह्वभिधानाभिरतस्त्वनृजुर्नवमांशजो भवति।।10।।
समकृष्णतनु: स्तब्ध: पूर्वमघान्त्येऽन्त्यकर्मा स्यात्।
नीच: प्रकृतिविरुद्धो विषमाक्षिनिरीक्षणो वृषस्याद्ये।।11।।
गम्भीरदृगलसात्मा विनतशिरावक्त्रकश्च लघुमेधा:।
प्रतिकूलकर्ममिथ्याबहुप्रलापी द्वितीये स्यात्।।12।।
मृद्वङ्गवान्व्मुष्मान्सुनसस्पष्टायताक्षबृहदङ्ग:।
यज्ञादिकर्मनिरत: स्थिरपार्ष्णिकरस्तृतीयनवमांशे।।13।।
ह्रस्वोदर: सुरोषो मेषाक्ष: पिङ्गलस्त्वधनयुक्त:।
परधनहरणाभिरतश्चतुर्थभागे वृषस्य नर:।।14।।
व्याल: सुतुङ्गघोणो महर्षभाकारवक्त्रघनकेश:।
स्यात्पञ्चमे विलासी बृहद्भुजस्कन्धकटिगौर:।।15।।
स्वक्ष: स्थिर: सुकेश: स्निग्धतनुर्वल्गुवाक्प्रगल्भ: स्यात्।
माधुर्यहास्यनिरत: कृश: सुनिपुणो भवेत्ष्ष्ठे।।16।।
मृतसुतयुवतीषु रतो मनाक्प्रलम्बाग्रनासिकाक्ष: स्यात्।
उद्बद्धांग: स्वजनद्वोषी गुरुपादसूक्ष्मकेशश्यच।।17।।
व्याघ्रेक्षण: सुदशनस्त्वचितस्फुटनासिकोऽल्पकर्मा स्यात्।
उद्वृत्तनीलकेशोग्रनखो मुखरस्तथाष्टमज:।।18।।
मान्योऽल्पसत्त्वभीरु: क्रोधी समरुचिरमूर्तिकितव: स्यात्।
सञ्चितधन: प्रसिद्ध: कृशस्त्वधस्तात्प्रलाप्यन्ते।।19।।
रोमोपचितांसभुजे घनासितापांगदृक्तथोच्चनस:।
दूर्वाकाझडश्याम: कृशाङ्घ्रिपाणिस्तृतीयभवनाद्ये।।20।।
घटशीर्षोऽशुचिकर्मा घातरुचिर्मध्यलग्नघोण: स्यात्।
बहुभाषी बहुचेष्टो द्वितीयभागे तु विग्रहाधिपति:।।21।।
गौरोऽतिरक्तनयन: सुनासिक: समतनु: सुमेधा स्यात्।
दीर्घाननोऽसितभ्रूर्वाचा चतुरस्तृतीयेंऽशे।।22।।
सुभ्रुललाटकामी नीलोत्पलमूर्तिर्विपुलवक्षा: स्यात्।
सितदन्तो(वक्त्रो) मृदुवक्त्र(वक्रं) प्रशस्तरोमाचितश्चतुर्थेऽशे।।23।।
पृथ्वाननो बृहत्स्फिक्पीवरवक्षोभुजश्च खल:।
स्थूलशिरा मायावी सितानुकूलेक्षणस्तु पञ्चमज:।।24।।
मध्वीक्षण: प्रलापी व्यस्तललाट: समस्सुतनु:।
कितवश्चलश्च रुचिरोष्ठरद: षष्ठे तु सत्त्वयुत:।।25।।
ताम्रारुणाक्षवर्ण: समुन्नताक्षो विशालवक्षा स्यात्।
शिक्षास्त्रशिल्पनिपुणो हास्यरति: सप्तमे जात:।।26।।
श्यामो गुरुर्मनस्वी ललितो मधुराभिधानश्च।
व्यस्तविवृन्शरीरो दीर्घासितदृक्कलाविदष्टमज:।।27।।
वृत्तासितदृक्सुतनु: सिद्धो मेधाबलो रतिज्ञ: स्यात्।
विज्ञानकाव्यनिरतो नवमे जायेत मिथुनस्य।।28।।
निर्मलचारुसुगौर: सुमूर्धज: स्याद्विशालकुक्षिश्च।
मंगलमुखोन्नताक्षस्तन्वंगभुज: कुलीराद्ये।।29।।
(छविचरणोढ:)रक्तच्छवीरणोग्र: कलाप्रिय: स्याद्विडालमुखनेत्र:।
कर्किद्वितीयभागे त्यागी कृशजानुजंघश्च।।30।।
गौर: सुनेत्रवाग्मी सुकुमारस्थूलयोषिदंगश्च।
धीमान्मृदुकर्मरतस्तृतीयभागे भवेदलस:।।31।।
श्यामच्छविर्नतभ्रूर्विशालपीनोन्नत: सुनासाक्ष:।
क्षीण: पुरुषो दाता स्वजातिकार्यश्चतुर्थे स्यात्।।32।।
घण्टास्वरो नतास्य: सुसंहतभ्रू: सुदीर्धबाहु: स्यात्।
सेवारतो विकर्मा मध्ये दुर्मर्षणोऽल्पमेधाश्च।।33।।
दीर्घविशालशरीर: प्रशस्तनयनो बहुप्रताप: स्यात्।
गौर: सुवंशघोणो वक्ता षष्ठे च पृथुदन्त:।।34।।
भिन्नशिरोरुहरोमा वृहत्तनु: स्यात्सिरालजङ्घश्च।
परगृहरक्षणशील: काकाकारश्च सप्तमज:।।35।।
घण्टाशिरा: कुशिल्पी सुमुखभुजांगश्च कूर्मगति:।
मध्यविलग्ननस: स्यादष्टभागे तु कुष्ठश्च।।36।।
गौरो झषनेत्रगुरुर्मृदूदरोऽथ पृथुपीनवक्षा: स्यात्।
दीर्घहनुर्लम्बोष्ठो महोरुकृशजानुगुल्फोऽन्त्ये।।37।।
मन्दोदर: प्रचण्डो रक्ताग्रनसो बृहच्छिरा: शूर:।
उन्नतमांसलवक्षा: सिंहे प्रथमे भवेद्भागे।।38।।
उन्नतविततललाटश्चतुरस्त्रतनुर्विलोमनेत्रश्च।
दीर्घभुजोन्नतवक्षा: पृथुग्रघोणो द्वितीयेंऽशे।।39।।
रोमान्वितायतभुजश्चकोरनयनस्तलस्त्यागी।
उन्नासिकस्तृतीये स्निग्धतनुर्बाहुवृत्तगल:।।40।।
घृतमण्डगौरगात्रो दीर्घासितलोचनो मृदुशिरोज:।
भिन्नध्वनिश्चतुर्थे पृथुकरचरणश्च भेककुक्षि: स्यात्।।41।।
घण्टाशिरोऽल्पकोशो सितघोणाक्षश्च लोमशांगतनु:।
लम्बोदरप्रचण्डो दंष्ट्रोत्कटपीनहृन्मध्ये।।42।।
स्त्रस्ताल्परोममूर्ति: स्निग्धसमासितविलोचनो दीर्घ:।
श्याम: सत्रीणां चतुरो विकत्थनो वाक्यपण्डित: षष्ठे।।43।।
दीर्घानन: सिराल: पीनतनु: स्त्रीषु दुर्भग: कृष्ण:।
स्यात्सप्तमे सुचण्डो रोमचित: कूटनिष्ठुराभाषी।।44।।
उत्कृष्टवाक्स्थिरांग: (सूभ्रूर्ग)सुभगो गम्भरीदृग्विकर्मा च।
नि:स्व: कूटकर: स्यादष्टमभागे प्रसूतश्च।।45।।
रासभमुखोऽसिताक्षो व्यालम्बभुज: सुपार्ष्णिजङ्घश्च।
श्वासनिपीडितवक्षा नवमांशे जायते मनुज:।।46।।
सारंगाक्षो वक्ता प्रदानसम्भोगवान्धनाढ्यश्च।
श्यामोन्नतहृदय: स्यात्षष्ठे प्रथमांशके जात:।।47।।
पूर्णानन: (वक्षा)सुचक्षु: (पिशुन: कलहप्रिय: सुगूढवया:)स्निग्धो मृदुवादशीलश्च।
लम्बोदरश्चल: स्याद्द्वितीयभागे महोरुश्च।।48।।
स्फुटनासिकापुट: स्यात्प्रशस्तपादश्च पीनपादभुज:(पाणि)।
विस्पष्टवाक्च गौर: कन्यासु सुहृत्तृतीयेंऽशे।।49।।
श्रुतवान्स्त्रीषु च रमते सुकुमारो मधुररक्तगौरश्च।
तीक्ष्णश्चतुर्थभागे प्रबोधनोऽध:कृशो द्वितूर्धा च।।50।।
स्थूलोष्ठबाहुरुन्नततनु: पृथुशिरोरुहांस: स्यात्।
पञ्चमज: पृथुवक्षा पराश्रयोद्बद्धजंघश्च।।51।।
स्निग्धच्छवि: सुवाक्य: शस्ततनु: शास्त्रकृतमतिप्रचुर:।
लिपिलेख्यकलाभिज्ञ: सुमना: षष्ठांशजी विहारी च।।52।।
ह्रस्ववदनोन्नतांस: स्निग्धभुजोन्तेऽन्ते च केशगौर: स्यात्।
सप्तमज: पृथुजठर: पृथुतरचरणोऽम्बुभीरुश्च।।53।।
सुकुमारगौरदीर्घश्चि त्रोन्नतदृक्प्रचण्डमानी स्यात्।
व्यालम्बपीनबाहु: पिंगलरोमाष्टमे जात:।।54।।
ख्यातो मृदुसुखमूर्तिर्विशालनेत्रो बलासदृशसत्त्व:।
चतुरो नवमेंऽशे स्यान्नतांसलेख्यादिविद्वांश्च।।55।।
गौरो विशालनेत्र: श्लाघी दीर्घाननोऽर्थगोप्ता स्यात्।
नवपण्यकर्मकुशलस्तुलाधराद्यैशज: सुविख्यात:।।56।।
प्लुतमण्डलनेत्र: स्यात्करालदन्तो निमग्नमध्यस्तु।
युगले विस्तृतहृदय: कुतनुर्घनसंहतभ्रूश्च।।57।।
गौरोऽश्वमुख: सुरदो महोन्नताक्ष: कृशोऽपि लब्धयशा:।
दीर्घकरोरुहघोणस्तृतीयज: स्यात्सुचरणश्च।।58।।
तन्वंसबाहुभीरुस्तून्नतदन्त: कृशो मृगतरलदृक्।
ह्रस्वनस: सुविषादी श्यामो शीलश्चतुर्थजो भवति।।59।।
गम्भीरदृक्स्थिरात्मा सुहृत्प्रिय: पंचमे ह्यमानी स्यात्।
खरकेश: समनेत्रो मध्यप्रतिलग्नघोणदृप्तश्च।।60।।
पीनाङ्गो गौर: स्याद्विशालनेत्र: सुनासिकावंश:।
स्निग्धनख: सुतयज्ञ: षष्ठेंऽशे शास्त्रविज्जात:।।61।।
रक्तावदातम(रति)तिमान्गुरुह्रस्वतनु: कृशो ललाटे स्यात्।
लुब्ध: प्रचण्डदुर्ग: सप्तमभागे मनस्वी च।।62।।
तुङ्गांसगण्डभोक्ता कठिनतनुर्दीर्घकृष्णभ्रू:।
निर्णिक्तवाक्प्रशान्त: सद्वक्षस्त्वर्धमस्तकोऽष्टमज:।।63।।
स्वक्ष: प्रसन्नगौर: समचारुतनु: पटु: कलाभिरत:।
दाक्षिण्यहास्यनिरतो विटस्वभावो भवेन्नवमे।।64।।
ह्रस्वोन्नतौष्ठघोण: सुललाट: स्याद्दृढाङ्गौरश्च।
दर्दुरकुक्षिर्धटकोऽष्टमराशौ प्रथमनवभागे।।65।।
गौर: पृथ्वायतहृद्बाहुस्ताम्रोग्रदृग्द्वितीये स्यात्।
उद्वृत्तबलनिहन्ता साहसकृदनल्पकेशश्च।।66।।
प्राज्ञो दृढांसबाहु: प्रयत्नकोशो विशुद्धवाक्य: स्यात्।
कानीनको वपुष्मान्गौरो रुचिराधरस्तृतीयेंऽशे।।67।।
परदारद्रोहरति: क्षेप्ता धीरश्चतुर्थजो दीर्घ:।
श्यामोऽसितकेशाक्षो नट: प्रगल्भश्च पीनरोमांस:।।68।।
गम्भीरस्ताम्राक्षो मग्ननस: पञ्चमे धीर:।
मृष्टोदरोग्रकर्मा व्यस्तदृढाङ्गो यशस्वी स्यात्।।69।।
धृष्टो वरिष्ठबुद्धि: पृष्ठोच्चनसो गम्भीरसत्त्व: स्यात्।
सुनय: प्रचण्डकर्मा षष्ठे दक्षोऽल्पकचधनभ्रूश्च।।70।।
दारितमुख: स्थिराङ्ग: प्रविकीर्णरद: शिरावनद्धाङ्ग:।
निम्नोदर: प्लुताक्ष: स्त्रस्ततनु: सप्तमे भवेदंशे।।71।।
स्फुटिताग्रनस: कालो विपन्नशीलो मलीमसाङ्ग: स्यात्।
भिन्नोत्कटै: शिरोजै: सन्त्यक्तमतिस्तथाष्टमज:।।72।।
गौरो मृगाकृतिमृदु: प्रशान्तपिङ्गाक्षरोमदृढपीन:।
सुसमेतश्च गुरूणां मत: प्रजातो नवमभागे।।73।।
सुबृहन्नसोजदृष्टि: स्फुटाग्रभाषी सुदन्तरोमा च।
गौर: सुबद्धवृषणश्चापाद्यांशे प्रचण्ड: स्यात्।।74।।
प्रोत्तुङ्गशिरा: स्थिरविद्विस्तीर्णाक्षो गुरुस्फिगूरुश्च।
विकृताग्रनसो दीर्घो महाहनु: स्याद्द्वितीयेंऽशे।।75।।
शिक्षाशास्त्रमतिज्ञ: प्रगल्भगम्भीरमूर्तिसुनयश्च।
स्त्रीवल्लभो मनस्वी तृतीयजो हास्यशिल्पज्ञ:।।76।।
दक्षो मधुमण्डलदृग्गौर: कच्छपविवृद्धकुक्षिश्च।
प्राज्ञो नट: सुकेश: पृथुशुभमूर्तिश्चतुर्थ: स्यात्।।77।।
पृथुकर्णनेत्रवदन: प्रबद्धहरिविग्रहो महाभ्रू: स्यात्।
पीनोन्नतांसहन्ता पञ्चमजो गूढरोमदृढबुद्धि:।।78।।
स्निग्धासितान्तपृथुदृक् महाललाट: सुमूर्तिकाव्यरत:।
पृथुपीनमुखो हीन: षष्ठे विद्वात्कथ: सुधन:।।79।।
श्यामो मृदुर्वचस्वी तुंगशिरा: सङ्ग्रहानुसन्धिरत:।
दीर्घो विशालनयनो दाक्षिण्य चण्डश्च सप्तमज:।।80।।
चिपिटाग्रनासिक: स्याद्विस्तीर्णशिरा: सुबद्धवैरश्च।
विभ्रान्तदृक्प्रलापी(भाषी) गुरुष्वभिमतोऽष्टमांशभव:।।81।।
गौरो हयाकृतिमुखो दीर्घासितदृक् तथाल्पवाक्य: स्यात्।
सत्य: सतां विषादी नवमे कुटिलोरुजंघश्च।।82।।
विरलाग्ररद: श्याम: प्रभिन्नवाक्योऽशिरोर्जा वरनास:।
गीताध्वहास्यनिरतो मकराद्ये चलधन: कृशांग: स्यात्।।83।।
अलसशठ: कुटिलनसो गीताभिरतिर्विशालदेहश्च।
प्रचुरांगनासु निरतो बहुभाषी स्याद्द्वितीयज: कल्प्य:।।84।।
गान्धर्वकलाकाम: ख्यातांगो गौरदृक्सुमनस:।
बहुमित्रबन्धुरतिमांस्तृतीयज: स्विष्टकर्मा च।।85।।
रक्तासितवृत्ताक्षो महाललाटभुजदुर्बलांगकर:।
भवति हि विकीर्णकेशश्चतुर्थजो विरलदन्तवाक्य: स्यात्।।86।।
उद्गण्डघोणकुक्षिर्भवति हि भोक्ता सुनासिकावंश:।
श्यामो वृत्तोरुभुज: पञ्चमभागे स्थिरारम्भ:।।87।।
स्निग्धच्छवि: सुवेष: कामरत: सूक्ष्मसमरदसुवक्ता।
षष्ठांशज: पृथुहनुर्महाललाट: पुमान्भवति।।88।।
श्यामोऽलस: सुभाषी कु(रूक्षित)ञ्चितकेशो बृहत्तनु: कठिन:।
मृदुपादपाणिमतिमान्सप्तमज: शीलसम्पन्न:।।89।।
गम्भीरदृक्सुघोणी रक्तास्यो भिन्ननखशिरोज: स्यात्।
उद्बद्धतनु: शक्तोऽष्टमजो घटपृथुललाटश्च।।90।।
विपुलाक्षिहृत्सुमेधा: पूर्णमुखो गीतवाद्यनिरतश्च।
माधुर्यसत्त्वयुक्त: साधुर्नवमे भवेत्सुजन:।।91।।
श्यामो मृदुः कृशांगः पीनहनुः शास्त्रकाव्यमतिः।
कामी रतिमान्कान्तः कुम्भस्याद्यांशके भवेज्जातः।।92।।
त्वङ्नखदृष्टिशिरोजै: खरैश्च सुविपन्नवत्सल: साधु:।
दीर्घो त्रिशिरा मूर्खो द्वितीयभागे भवेज्जात:।।93।।
संसक्ततनु: प्रमदाप्रियश्च वैदूर्यकान्तिधर:।
शास्त्रार्थवित्प्रयोक्ता तृतीयनवभागसंजात:।।94।।
कान्तानुरतो गौरो विदारितास्यो रिपुप्रणाशकर:।
गम्भीरधीरसत्त्वश्चतुर्थजो भोगरतियुक्त:।।95।।
स्पष्टार्थवित्कलाज्ञ: खररोमधराङ्ध्रिरुग्र: स्यात्।
संरुद्धगण्डकर्ण: पञ्चमज: कृष्णवर्णश्च।।96।।
व्याघ्रानन: प्रगल्भ: कुञ्चितकेश: सुनिश्चितार्थश्च।
व्यालमृगोरगहन्ता षष्ठेंऽशे वल्लभो नृपते:।।97।।
मेषाक्षिमुखस्तीक्ष्णो ग्राम्यरति: स्त्रीषु परिभूत:।
पित्तरुगर्दितदेह: सप्तमज: सत्त्वधृतियुक्त:।।98।।
स्थिरसत्त्वबुद्धिरतिमान्नरेन्द्रयोधो नरेश्वर: सुभग:।
स्थूलरदो विपुलाक्ष: कुम्भे स्यादष्टमेंऽशके पुरुष:।।99।।
श्याम: सम(वदनो)ग्रदशनो विशेषित: सुधनदारपुत्रश्च।
नवमांशज: सुवाक्य प्रथित: शक्तो भवेत्पुरुष:।।100।।
गौरोऽपि रक्तदेह: प्रभामृदुस्त्रीमतिप्रचलचित्त:।
ह्रस्वगल: कृशमध्यो मीनस्याद्यांशके पुरुष:।।101।।
(पृथुपीनमुग्रनास:)पृथुपीनभग्ननास: क्रियापटुर्मांसभुग्रुचिरदेह:।
काननपर्वतचारी बृहच्छिरा: स्याद्द्वितीयांशे।।102।।
गौर: शठ: सुचक्षु: शस्ततनुर्धर्मवान्सुविद्वांश्च।
दाक्षिण्यवान्विनीतस्तृतीयजो रूपवांश्चतुर:।।103।।
गुणवान्विपन्नशील: प्रवृद्धसेवी क्रिया(पटुर्वीर:)पटुर्विद्वान्।
सत्त्वाधिको नयज्ञस्तुङ्गनस: स्याच्चतुर्थे तु।।104।।
दीर्घोऽसित: प्रतापी तुङ्गाङ्ग: स्वल्पनासिक: स्वक्ष:।
हिंसारति: शुभरदो दुष्प्रसह: पञ्चमे प्रलापी स्यात्।।105।।
कान्त: प्रतापगुणवान्प्रसन्नवंशोऽल्पनासिको मादी।
तिर्यग्वदन: ख्यात: षष्ठेंऽशे स्यात्तथा निपुण:।।106।।
पुरुषाभिमानपरकृद्धर्मरुचि: श्रेष्ठकश्च सचिव: स्यात्।
प्रबलो विषादशील: (शठ:)शठोऽस्थिर: सप्तमे भागे।।107।।
दीर्घो बृहच्छिरा: स्यात्कृशोऽलसो रूक्षनेत्रकेशश्च।
मन्दात्मजोऽर्थनिरतो रणकुशलो ह्यष्टमे भागे।।108।।
ह्रस्वो मृदु: सुधीरो विशालवक्षोक्षिनासिक: स्निग्ध:।
(वित)विहिताङ्गबुद्धिगुणवान्नमेंऽशे स्यात्पुमान्ख्यात:।।109।।
यत्प्रोक्तं(प्रोक्तामशादि) राशिफलं द्वादशभागेऽपि तत्फलं वाच्यम्।
सप्तमभागसमानं शेषेषु विनिर्दिशेत्प्राज्ञ:।।110।।
इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां नष्टजातकाध्याये नववर्गगुणचिन्ता नाम पञ्चाशोऽध्यायः।।