।।श्रीगणेशाय नमः।।
श्रीमत्कल्याणवर्मसूरिविरचिता
सारावली

अष्टादशोऽध्याय:
(पञ्चग्रहयोगाध्याय:)

दु:खी बहुप्रपञ्चो जायाविरहेण तापितशरीर:।

भवति पुमानेकस्थै रवीन्दुकुजजीवचन्द्रसुतै:।।1।।

परकर्मतो नित्यं बन्धुसुहृद्भि(बन्धुसुहृद्विकृतो, बन्धुसुहृद्दुःखितो) कृतो विगतसत्त्व:।

क्लीबैर्यति च सख्यं रवीन्दुकुजशुक्रसौम्यैश्च।।2।।

अल्पायुर्बन्धनभाग्दीनो भवतीह सर्वसुखहीन:।

अकलत्रोऽसुतवित्त: सौरदिवाकरबुधेन्दुकुजै:।।3।।

जात्यन्धो बहुदु:खी मातृपितृभ्यां सदैव सन्त्यक्त:।

भवति नरो गेयरुचि: कुजेन्दुगुरुभार्गवार्कैश्च।।4।।

युद्धकुशल: समर्थ: परवित्तहर: परोपतापी च।

(पिशुन: खलश्च)पिशुनश्चलश्च पुरुष: शनिशशिकुजजीवदिवसेशै:।।5।।

मानार्थविभवहीनो मलिनाचार: पराङ्गनानिरत:(भिरत:)

पञ्चभिरेकस्थै: स्याद्दिनेशशशिशुक्रशनिभौमै:।।6।।

यन्त्रज्ञो बहुविभवो नृपसचिवो दण्डनायको वा स्यात्।

ख्यात: शुभकीर्तियुतो बुधेन्दुरविजीवशुक्रैश्च।।7।।

भीरु: प्रियसन्त्यक्त: सोन्मादो वञ्चनासु निपुणश्च।

उग्र: परान्नभोजी बुधेन्दुगुरुसूर्यरविपुत्रै:।।8।।

दीर्घो रोमशगात्रो मरणोत्साही सुखार्थसुतहीन:।

स्यात्पञ्चभिरेकस्थै रविचन्द्रबुधार्किभृगुपुत्रै:।।9।।

वाग्मीन्द्रजालनिरतश्चलचित्त: स्त्रीषु वल्लभो मतिमान्।

बहुशत्रुर्विगतभयो रवीन्दुगुरुशुक्रभानुसुतै:।।10।।

कामी बहुतुरगनर: (स्फीत: सेनापति:)स्वीकृतसेनापतिर्विगतशोक:।

राजप्रियोऽतिसुभगो बुधाररविजीवशुक्रै: स्यात्।।11।।

नित्योद्विग्नो रोगी भिक्षां भुङ्क्ते गृहाद्गृहं गत्वा।

जीर्णमलीमसवासा रविकुजबुधजीवरविपुत्रै:।।12।।

वधबन्धनरोगार्तो विद्वाँल्लोके सुपूजितो भवति।

नि:स्वो विकलशरीर: कुजशशिबुधशुक्रमन्दै: स्यात्।।13।।

व्याधिभिररिभिर्ग्रस्त: स्थानभ्रष्टोऽतिदु:खसन्तप्त:।

भ्रमति क्षुभित: पुरुष: कुजार्किरविशुक्रशशितनयै:।।14।।

प्रेष्यो मूर्ख: क्लीबो मलिनाचारोऽतिदुर्भगो विकल:।

भवति नरो धनरहित: शशिकुजगुरुशुक्ररवितनयै:।।15।।

जलयन्त्रधातुपारदरसायनेष्वतिपटु: पुमान् भवति।

एभि: प्रसिद्धकर्मा क्षितिसुतरविजीवसितसौरै:।।16।।

बहुशास्त्रज्ञानपटुर्मित्रहित: संमतो गुरूणां च।

धर्मपर: कारुणिक: सूर्यासितशुक्रबुधजीवै:।।17।।

साधु: कल्यशरीरो विद्याधनसत्यसौख्यसम्पन्न:।

बन्धुहितो बहुमित्रो बुधेन्दुकुजजीवभृगुपुत्रै:।।18।।

तिमिरामयी दरिद्र: परान्नमभियाचयते सदा दीन:।

मलिनयति  बन्धुवर्गं कुजार्किबुधजीवहिमकरणै:।।19।।

बहुशत्रुमित्रपक्ष: परार्थहितकृद्विषमशील:।

एकस्थैरतिमानी बुधेन्दुकुजशुक्ररविपुत्रै:।।20।।

नृपमन्त्री नृपतिसमो गणनाथ: सर्वलोकपूज्यश्च।

एकर्क्षे भवति नरश्चन्द्रेन्दुजजीवशनिशुक्रै:।।21।।

सुमनस्क: सोन्मादो राज्ञामतिवल्लभो विगतशोक:।

निद्रातुरो दरिद्र: कुजगुरुबुधशुक्ररविपुत्रै:।।22।।

इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां पञ्चग्रहयोगो नामाष्टादशोऽध्याय: