दु:खी बहुप्रपञ्चो जायाविरहेण तापितशरीर:।
भवति पुमानेकस्थै रवीन्दुकुजजीवचन्द्रसुतै:।।1।।
परकर्मतो नित्यं बन्धुसुहृद्भि(बन्धुसुहृद्विकृतो, बन्धुसुहृद्दुःखितो) कृतो विगतसत्त्व:।
क्लीबैर्याति च सख्यं रवीन्दुकुजशुक्रसौम्यैश्च।।2।।
अल्पायुर्बन्धनभाग्दीनो भवतीह सर्वसुखहीन:।
अकलत्रोऽसुतवित्त: सौरदिवाकरबुधेन्दुकुजै:।।3।।
जात्यन्धो बहुदु:खी मातृपितृभ्यां सदैव सन्त्यक्त:।
भवति नरो गेयरुचि: कुजेन्दुगुरुभार्गवार्कैश्च।।4।।
युद्धकुशल: समर्थ: परवित्तहर: परोपतापी च।
(पिशुन: खलश्च)पिशुनश्चलश्च पुरुष: शनिशशिकुजजीवदिवसेशै:।।5।।
मानार्थविभवहीनो मलिनाचार: पराङ्गनानिरत:(भिरत:)।
पञ्चभिरेकस्थै: स्याद्दिनेशशशिशुक्रशनिभौमै:।।6।।
यन्त्रज्ञो बहुविभवो नृपसचिवो दण्डनायको वा स्यात्।
ख्यात: शुभकीर्तियुतो बुधेन्दुरविजीवशुक्रैश्च।।7।।
भीरु: प्रियसन्त्यक्त: सोन्मादो वञ्चनासु निपुणश्च।
उग्र: परान्नभोजी बुधेन्दुगुरुसूर्यरविपुत्रै:।।8।।
दीर्घो रोमशगात्रो मरणोत्साही सुखार्थसुतहीन:।
स्यात्पञ्चभिरेकस्थै रविचन्द्रबुधार्किभृगुपुत्रै:।।9।।
वाग्मीन्द्रजालनिरतश्चलचित्त: स्त्रीषु वल्लभो मतिमान्।
बहुशत्रुर्विगतभयो रवीन्दुगुरुशुक्रभानुसुतै:।।10।।
कामी बहुतुरगनर: (स्फीत: सेनापति:)स्वीकृतसेनापतिर्विगतशोक:।
राजप्रियोऽतिसुभगो बुधाररविजीवशुक्रै: स्यात्।।11।।
नित्योद्विग्नो रोगी भिक्षां भुङ्क्ते गृहाद्गृहं गत्वा।
जीर्णमलीमसवासा रविकुजबुधजीवरविपुत्रै:।।12।।
वधबन्धनरोगार्तो विद्वाँल्लोके सुपूजितो भवति।
नि:स्वो विकलशरीर: कुजशशिबुधशुक्रमन्दै: स्यात्।।13।।
व्याधिभिररिभिर्ग्रस्त: स्थानभ्रष्टोऽतिदु:खसन्तप्त:।
भ्रमति क्षुभित: पुरुष: कुजार्किरविशुक्रशशितनयै:।।14।।
प्रेष्यो मूर्ख: क्लीबो मलिनाचारोऽतिदुर्भगो विकल:।
भवति नरो धनरहित: शशिकुजगुरुशुक्ररवितनयै:।।15।।
जलयन्त्रधातुपारदरसायनेष्वतिपटु: पुमान् भवति।
एभि: प्रसिद्धकर्मा क्षितिसुतरविजीवसितसौरै:।।16।।
बहुशास्त्रज्ञानपटुर्मित्रहित: संमतो गुरूणां च।
धर्मपर: कारुणिक: सूर्यासितशुक्रबुधजीवै:।।17।।
साधु: कल्यशरीरो विद्याधनसत्यसौख्यसम्पन्न:।
बन्धुहितो बहुमित्रो बुधेन्दुकुजजीवभृगुपुत्रै:।।18।।
तिमिरामयी दरिद्र: परान्नमभियाचयते सदा दीन:।
मलिनयति बन्धुवर्गं कुजार्किबुधजीवहिमकरणै:।।19।।
बहुशत्रुमित्रपक्ष: परार्थहितकृद्विषमशील:।
एकस्थैरतिमानी बुधेन्दुकुजशुक्ररविपुत्रै:।।20।।
नृपमन्त्री नृपतिसमो गणनाथ: सर्वलोकपूज्यश्च।
एकर्क्षे भवति नरश्चन्द्रेन्दुजजीवशनिशुक्रै:।।21।।
सुमनस्क: सोन्मादो राज्ञामतिवल्लभो विगतशोक:।
निद्रातुरो दरिद्र: कुजगुरुबुधशुक्ररविपुत्रै:।।22।।
इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां पञ्चग्रहयोगो नामाष्टादशोऽध्याय: