।।श्रीगणेशाय नमः।।
श्रीमत्कल्याणवर्मसूरिविरचिता
सारावली

सप्तदशोऽध्याय:
(चतुर्ग्रहयोगाध्याय:)

लिपिकरतस्करमुखरो रोगी मायाप्रपञ्चकुशलश्च।

बुधरविभौमशशाङ्कैरेकर्क्षगतै: पुमान्भवति।।1।।

धनवान्वनितानिन्द्यस्तेजस्वी नीतिमान्विगतशोक:।

कर्मसमर्थो निपुण: शशिकुजगुरुभास्करै: सहितै:।।2।।

(उग्रो हुतभुक्तीव्र:)आर्योचितवाग्वृत्ति: सुखभाङ्निपुणोऽर्थसंग्रहणशील:।

विद्यासुतदारयुत: शशिकुजभृगुभास्करै: सहितै:।।3।।

विषमशरीरो ह्रस्वो धनरहितो यातिताशनो मूर्ख:।

गम्य: सर्वस्य तथा रविशशिकुजसौरिसंयोगे।।4।।

(सौवर्णक:)सौवर्णिक: प्लुताक्ष: शिल्पकारो वा महाधनो धीर: (वीर:)

(गाम्भीर्यो रुचिर)जात: स्यान्निरुजतनु: शशिज्ञगुरुभास्करै: सहितै:।।5।।

विकल: सुभगो वाग्मी (त्रस्ताक्षो भूपसंमतो, पिङ्गाक्षी भूपसंमतो)ह्रस्वो नृपसंमतो मनुज:।

जात: स्यादेकस्थै रविशशिबुधभार्गवै: सहितै:।।6।।

मातृपितृविप्रयुक्तो धनसौख्यविवर्जितो भ्रमणशील:।

भिक्षाशनोऽप्यनृतवाक् रवीन्दुसौम्यार्किभिर्नियतम्।।7।।

सलिलमृगारण्यानां स्वामी स्यात्सौख्यभाक्(नृपतिपूज्य:) भवति पूज्य:।

शुक्रार्कगुरुशशाङ्कैरेकर्क्षगतै: पुमान् निपुण:।।8।।

तामसनेत्रस्तीक्ष्णो बहुसुतवित्तो वराङ्गनासुभग:।

सूर्येज्यचन्द्रसौररेकस्थैर्जायते पुरुष:।।9।।

वनितासदृशाचार: पुर:सरोऽत्यन्तदुर्बलशरीर:।

भीरु: सर्वत्र भवेदर्केन्दुसितासितै: सहितै:।।10।।

शूरोऽथ सूत्रकारश्चक्र(चरो)धरो वा विपन्नदारधन:।

दु:खार्णवोऽटनपर: सुसङ्गतैरर्कजीवबुधभौमै:।।11।।

परदाररतश्चौरो विषमाङ्गो दुर्जनो विगतसत्त्व:।

भवति प्रसवे पुरुषो रविसितभौमेन्दुजै: सहितै:।।12।।

योद्धा(योध:) प्राज्ञस्तीक्ष्णो नीचाचार: कविप्रधानश्च।

मन्त्री च भूपतिर्वा बुधार्ककुजसौरिसंयोगे।।13।।

सुभग: पूज्यो लोके धनवान् नृपसंमतो भुवि ख्यात:।

रविभौमजीवशुक्रैरेकस्थैर्नीतिमान्पुरुष:।।14।।

सोन्मादो गणमान्य: सिद्धार्थो बन्धुमित्रसंपृक्त:।

भानुकुजजीवसौरे: संयुक्तैर्वा नृपाभिमत:।।15।।

विकलो नीचाचारो विषमाक्षो बन्धु विद्विष्ट:।

सूर्यकुजशुक्रसौरै: पराभवं सर्वतो याति।।16।।

धनवान्सुखप्रधान: सिद्धार्थो बन्धुमान् प्रकृष्टश्च।

भानुबुधजीवशुक्रैर्भवति  पुमानेकराशिगतै:।।17।।

क्लीबाचारो मान कलहरुचि: (सहजवाङ्)सहजवान् निरुत्साह:।

अर्कार्किबुधसुरेज्यैरेकस्थैर्जायते पुरुष:।।18।।

मुखर: सुभग: प्राज्ञो मृदुसौख्य: सत्त्वशौचसंपन्न:।

धीरो मित्रसहायो रविबुधसितसौरिसंयोगे।।19।।

लुब्ध: कवि: प्रधान: कारुकनाथोऽधिपश्च नीचानाम्।

आदित्यार्किसितार्यै राज्ञां जातो भवेदिष्टा:।।20।।

शास्त्रकुशलो नरेन्द्र: सुमहामन्त्रोऽथवा महाबुद्धि:।

शशिकुजसोमजजीवैरेकस्थैर्य: पुमाञ्जात:।।21।।

कलहरुचिर्निद्रालुर्नीच: स्याद्वर्धकीपति: सुभग:।

बन्धुद्वेष्टा न सुखी शशिकुजबुधभार्गवै: सहितै:।।22।।

शूरो विमातृपितृको दुष्कुलजो बहुकलत्रमित्रसुत:।

भवति सुकर्माभिरत: शशिकुजबुधसौरिसंयोगे।।23।।

विकलाङ्ग सुकलत्र: (कष्टसहो)सकलसहोऽतीवमानसंयुक्त:।

प्राज्ञो बहुमित्रसुख: शशिकुजगुरुभार्गवै: सहितै:।।24।।

बधिरो धनावाञ्शूर: सोन्मादो वाक्पटु: स्थिरप्रकृति:।

मतिमानुदारचित्तो भौमेन्दुशनैश्चरसुरेज्यै:।।25।।

कुलटापति: प्रगल्भ: सर्पाक्षो नित्यमेव सोद्वेग:।

जात: पुरुषोऽवश्यं कुजेन्दुयमभार्गवैर्भवति।।26।।

विद्वान्विमातृपितृक: सद्रूपो धनयुतोऽतिसुभगश्च।

भवति नरो विगतारिर्बुधगुरुशशिभार्गवै: सहित:।।27।।

कृतधर्मकीर्तिरग्र्यस्तेजस्वी बन्धुवल्लभो मतिमान्।

नृपसचिव: प्रवरकवि: शशिधजीवार्किभि : सहितै:।।28।।

परदारगमनशीलो विशीलभार्यो विपन्नबन्धुश्च।

प्राज्ञो लोकद्विष्ट:(द्वेष्टा) स्यादिन्दुबुधार्किभृगुपुत्रै:।।29।।

मात्रा रहित: सुभगस्त्वग्दोषी दु:खितो भ्रमणशील:।

बहुभाषी सत्यरत: शशिगुरुभृगुसौरिभि: सहितै:।।30।।

(रुचिर)स्त्रीकलहरुचिर्धनभाक्पूज्यो लोके च शीलसंपन्न:। 

भवति पुमान्निरुजतनुर्बुधारगुरुभार्गवै: सहितै:।।31।।

शूरो विद्वान्वाग्मी धनरहित: सत्यशौचसंपन्न:।

वादी द्वन्द्वसहिष्णुर्मतिमान्सहितैर्बुधारगुरुसौरै:।।32।।

स्यान्मल्ल; परपुष्ट: कठिनाङ्गो युद्धदुर्मद: ख्यात:।

रमते च सारमेयैर्बुधारयमभार्गवै: सहितै:।।33।।

तेजस्वी वित्तयुत: स्त्रीलोल: साहसप्रियश्चपल:।

भौमगुरुशुक्रशौरैरेकस्थैर्जायते कितव:।।34।।

मेधावी (शस्त्र, शास्त्र)श्राद्धरतो (कामाचारो)रामासक्ता विधेयभृत्यश्च।

बुधजीवशुक्रसौरैरेकस्थैस्तीव्रसंयोगे।।35।।

इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां चदुर्ग्रहयोगः सप्तदशोऽध्यायः