लिपिकरतस्करमुखरो रोगी मायाप्रपञ्चकुशलश्च।
बुधरविभौमशशाङ्कैरेकर्क्षगतै: पुमान्भवति।।1।।
धनवान्वनितानिन्द्यस्तेजस्वी नीतिमान्विगतशोक:।
कर्मसमर्थो निपुण: शशिकुजगुरुभास्करै: सहितै:।।2।।
(उग्रो हुतभुक्तीव्र:)आर्योचितवाग्वृत्ति: सुखभाङ्निपुणोऽर्थसंग्रहणशील:।
विद्यासुतदारयुत: शशिकुजभृगुभास्करै: सहितै:।।3।।
विषमशरीरो ह्रस्वो धनरहितो यातिताशनो मूर्ख:।
गम्य: सर्वस्य तथा रविशशिकुजसौरिसंयोगे।।4।।
(सौवर्णक:)सौवर्णिक: प्लुताक्ष: शिल्पकारो वा महाधनो धीर: (वीर:)।
(गाम्भीर्यो रुचिर)जात: स्यान्निरुजतनु: शशिज्ञगुरुभास्करै: सहितै:।।5।।
विकल: सुभगो वाग्मी (त्रस्ताक्षो भूपसंमतो, पिङ्गाक्षी भूपसंमतो)ह्रस्वो नृपसंमतो मनुज:।
जात: स्यादेकस्थै रविशशिबुधभार्गवै: सहितै:।।6।।
मातृपितृविप्रयुक्तो धनसौख्यविवर्जितो भ्रमणशील:।
भिक्षाशनोऽप्यनृतवाक् रवीन्दुसौम्यार्किभिर्नियतम्।।7।।
सलिलमृगारण्यानां स्वामी स्यात्सौख्यभाक्(नृपतिपूज्य:) भवति पूज्य:।
शुक्रार्कगुरुशशाङ्कैरेकर्क्षगतै: पुमान् निपुण:।।8।।
तामसनेत्रस्तीक्ष्णो बहुसुतवित्तो वराङ्गनासुभग:।
सूर्येज्यचन्द्रसौरैरेकस्थैर्जायते पुरुष:।।9।।
वनितासदृशाचार: पुर:सरोऽत्यन्तदुर्बलशरीर:।
भीरु: सर्वत्र भवेदर्केन्दुसितासितै: सहितै:।।10।।
शूरोऽथ सूत्रकारश्चक्र(चरो)धरो वा विपन्नदारधन:।
दु:खार्णवोऽटनपर: सुसङ्गतैरर्कजीवबुधभौमै:।।11।।
परदाररतश्चौरो विषमाङ्गो दुर्जनो विगतसत्त्व:।
भवति प्रसवे पुरुषो रविसितभौमेन्दुजै: सहितै:।।12।।
योद्धा(योध:) प्राज्ञस्तीक्ष्णो नीचाचार: कविप्रधानश्च।
मन्त्री च भूपतिर्वा बुधार्ककुजसौरिसंयोगे।।13।।
सुभग: पूज्यो लोके धनवान् नृपसंमतो भुवि ख्यात:।
रविभौमजीवशुक्रैरेकस्थैर्नीतिमान्पुरुष:।।14।।
सोन्मादो गणमान्य: सिद्धार्थो बन्धुमित्रसंपृक्त:।
भानुकुजजीवसौरे: संयुक्तैर्वा नृपाभिमत:।।15।।
विकलो नीचाचारो विषमाक्षो बन्धु विद्विष्ट:।
सूर्यकुजशुक्रसौरै: पराभवं सर्वतो याति।।16।।
धनवान्सुखप्रधान: सिद्धार्थो बन्धुमान् प्रकृष्टश्च।
भानुबुधजीवशुक्रैर्भवति पुमानेकराशिगतै:।।17।।
क्लीबाचारो मानो कलहरुचि: (सहजवाङ्)सहजवान् निरुत्साह:।
अर्कार्किबुधसुरेज्यैरेकस्थैर्जायते पुरुष:।।18।।
मुखर: सुभग: प्राज्ञो मृदुसौख्य: सत्त्वशौचसंपन्न:।
धीरो मित्रसहायो रविबुधसितसौरिसंयोगे।।19।।
लुब्ध: कवि: प्रधान: कारुकनाथोऽधिपश्च नीचानाम्।
आदित्यार्किसितार्यै राज्ञां जातो भवेदिष्टा:।।20।।
शास्त्रकुशलो नरेन्द्र: सुमहामन्त्रोऽथवा महाबुद्धि:।
शशिकुजसोमजजीवैरेकस्थैर्य: पुमाञ्जात:।।21।।
कलहरुचिर्निद्रालुर्नीच: स्याद्वर्धकीपति: सुभग:।
बन्धुद्वेष्टा न सुखी शशिकुजबुधभार्गवै: सहितै:।।22।।
शूरो विमातृपितृको दुष्कुलजो बहुकलत्रमित्रसुत:।
भवति सुकर्माभिरत: शशिकुजबुधसौरिसंयोगे।।23।।
विकलाङ्ग सुकलत्र: (कष्टसहो)सकलसहोऽतीवमानसंयुक्त:।
प्राज्ञो बहुमित्रसुख: शशिकुजगुरुभार्गवै: सहितै:।।24।।
बधिरो धनावाञ्शूर: सोन्मादो वाक्पटु: स्थिरप्रकृति:।
मतिमानुदारचित्तो भौमेन्दुशनैश्चरसुरेज्यै:।।25।।
कुलटापति: प्रगल्भ: सर्पाक्षो नित्यमेव सोद्वेग:।
जात: पुरुषोऽवश्यं कुजेन्दुयमभार्गवैर्भवति।।26।।
विद्वान्विमातृपितृक: सद्रूपो धनयुतोऽतिसुभगश्च।
भवति नरो विगतारिर्बुधगुरुशशिभार्गवै: सहित:।।27।।
कृतधर्मकीर्तिरग्र्यस्तेजस्वी बन्धुवल्लभो मतिमान्।
नृपसचिव: प्रवरकवि: शशिधजीवार्किभि : सहितै:।।28।।
परदारगमनशीलो विशीलभार्यो विपन्नबन्धुश्च।
प्राज्ञो लोकद्विष्ट:(द्वेष्टा) स्यादिन्दुबुधार्किभृगुपुत्रै:।।29।।
मात्रा रहित: सुभगस्त्वग्दोषी दु:खितो भ्रमणशील:।
बहुभाषी सत्यरत: शशिगुरुभृगुसौरिभि: सहितै:।।30।।
(रुचिर)स्त्रीकलहरुचिर्धनभाक्पूज्यो लोके च शीलसंपन्न:।
भवति पुमान्निरुजतनुर्बुधारगुरुभार्गवै: सहितै:।।31।।
शूरो विद्वान्वाग्मी धनरहित: सत्यशौचसंपन्न:।
वादी द्वन्द्वसहिष्णुर्मतिमान्सहितैर्बुधारगुरुसौरै:।।32।।
स्यान्मल्ल; परपुष्ट: कठिनाङ्गो युद्धदुर्मद: ख्यात:।
रमते च सारमेयैर्बुधारयमभार्गवै: सहितै:।।33।।
तेजस्वी वित्तयुत: स्त्रीलोल: साहसप्रियश्चपल:।
भौमगुरुशुक्रशौरैरेकस्थैर्जायते कितव:।।34।।
मेधावी (शस्त्र, शास्त्र)श्राद्धरतो (कामाचारो)रामासक्ता विधेयभृत्यश्च।
बुधजीवशुक्रसौरैरेकस्थैस्तीव्रसंयोगे।।35।।
इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां चदुर्ग्रहयोगः सप्तदशोऽध्यायः