।।श्रीगणेशाय नमः।।
श्रीमत्कल्याणवर्मसूरिविरचिता
सारावली

षोडशोऽध्याय:
(त्रिग्रहयोगाध्याय:)

निर्लज्ज: पापरतो यन्त्रज्ञ: शत्रुदारणे शूर:।

(अखिल)अश्मक्रियासु कुशल: सहस्थितै: सूर्यशशिभौम:।।1।।

तेजस्वी निपुणमति: शास्त्रकलागोष्ठिपानरत:।

नृपकृत्यकरो(रतो) धीरो रविशशिशशिजै: सहैकस्थै:।।2।।

क्रुद्धो मायानिपुण: सेवाकुशलो विदेशगमनरत:।

मेधावी चपलमति: सहस्थितैरर्कशशिजीवै:।।3।।

परधनहरणे निपुण: परदाररतश्च शास्त्रनिपुणश्च।

रविचन्द्रदैत्यपूज्यैरेकस्थैर्जायते मनुज:।।4।।

कामे(कामविवादे) विवादकुशलो मूर्ख: परतन्त्रगो दरिद्रश्च।

सूर्यनिशाकररविजैरेकस्थैर्जायते मनुज:।।5।।

भवति ख्यातो मल्ल: साहसिको निष्ठुरो विगतलज्ज:।

धनसुतकलत्ररहित: सहस्थितैरर्ककुजसौम्यै:।।6।।

वचसि निपुणो महार्थ: क्षितिपतिमन्त्री च(चमूपति:) भूपतिर्वाऽपि।

सत्यवचन: प्रचण्ड: सहस्थितैर्भौमगुरुसूर्यै:।।7।।

नयनातुर: कुलीन:क सुभगो वाक्शल्यसंयुतो मनुज:।

भृगुभौमदिवसनाथै: सहस्थितै: स्याद्विभवयुक्त:।।8।।

विकलाङ्गो धनरहितो नित्यं रोगान्वितो मनुज:।

स्वजनरहितोऽतिमूर्ख: क्षितिजार्कजभानुभि: सहितै:।।9।।

नेत्रातुरोऽतिधनवान् (शास्त्रकथाकाव्यगोष्ठिशिल्परत:)मूर्ख: शास्त्रादिशिल्पकाव्यरत:।

वाचस्पतिबुधसूर्यैरेकगतैर्लिपिकर: पुरुष:।।10।।

(अभिशस्तो)अतितप्तो वाचाटो भ्रमणरुचि: प्रोषितो गुरुभि:।

स्त्रीहेतो: सन्तप्त: शशिसुतरविभार्गवै: सहितै:।।11।।

क्लीबाचारो द्वेष्य: सर्वजितो बन्धुभि: परित्यक्त:।

सौरादित्येन्दुसुतैरेकस्थैर्जायते पुरुष:।।12।।

दुर्बलचक्षु: शूर: प्राज्ञो नि:स्वश्च भूपते: सचिव:।

परकार्यरतो नित्यं भार्गवगुरुभास्करै: सहितै:।।13।।

असदृशकाय: पूज्य: स्वजनद्वेष्य: सुदारसुतमित्र:।

नृपतीष्टो विगतभयो जीवार्कजदिनकरै: सहितै:।।14।।

शत्रुभयात्सोद्वेगो मानकलाकाव्यवर्जितो मनुज:।

कुत्सितचरित: कुष्ठी सितार्किरविसंयुतैर्भवति।।15।।

पापकरा जायन्ते नीचाचारा: सुहृत्स्वजनहीना:।

आजीविनश्च पुरुषा: शशाङ्कबुधभूमिजै: सहितै:।।16।।

(व्रणिताङ्ग:)विनताङ्ग स्त्रीलोलश्चोर: कान्तश्च संमत: स्त्रीणाम्।

भौमशशाङ्कसुरेज्यैरेकस्थैश्चण्डरोषश्च।।17।।

दु:शीलाया: पुत्र: पतिश्च तस्या: सदैव निर्दिष्ट:।

कुजभृगुशशिभि: सहितैर्भ्रमणरुचि: शीतभीतश्च(भीरुश्च)।।18।।

बाल्ये मृतजननीक: क्षुद्रो विषमश्च लोकविद्विष्ट:।

जायेत नरो योगे भूसुतशशिभास्करसुतानाम्।।19।।

धनवान्कल्यो वाग्मी तेजस्वी ख्यातिमान्विपुलकीर्ति:।

बहुपुत्रभ्रातृयुतो बुधेन्दुसुरपूजितैर्युक्तै:।।20।।

विद्यासंस्कृतमतिरपि नीचाचार: पुमान्भवेज्जात:।

सौम्यो(सेर्ष्यो) धनप्रलुब्धो बुधभार्गवचन्द्रसंयोगे।।21।।

अस्वस्थो(अस्वातन्त्र्यो विकल:) विकलाङ्ग: प्राज्ञो वाग्मी सुपूजित: क्षितिप:।

भवति नर: संयोगे सौरेन्दुशशाङ्कपुत्राणाम्।।22।।

साध्वीतनय: प्राज्ञ: कलास्वभिज्ञो बहुश्रुत: साधु:।

भार्गवगुरुशशियोगे जात: सुभगो भवेत्पुरुष:।।23।।

शास्त्रार्थतत्त्वबुद्धिर्वृद्धस्त्रीसङ्गतो (रोष:)विगतरोग:।

शशिवाचस्पतिसौरैरेकस्थैर्ग्रामवृन्दपति:।।24।।

लिपिकरपुस्तकवाचकपुरोधसां भवति जन्म सुकृतैश्च।

दैवविदां पुरुषाणां शशिभार्गवसौरिसंयोगे।।25।।

सुकवि: क्षोणीनाथ: सद्युवतिपति: परार्थ उद्युक्त:।

गान्धर्ववेदकुशल: स्याद्बुधगुरुभूसुतै: सहितै:।।26।।

अकुलीनो विकलाङ्गश्चपलो दुष्टश्च जायते मनुज:।

मुखरो नित्योत्साही कुजबुधभृगुनन्दनै: सहितै:।।27।।

प्रेष्य: श्यामलनेत्र: प्रवासशीलो भवेद्वदनरोगी।

रमते प्रहसनशीलैर्बुधार्किरुधिरै: सहैकस्थै:।।28।।

नृपतीष्ट: सत्सुतवान्विलासिनीभ्य: सदाप्तबहुसौख्य:।

सकलजनानन्दकरो भार्गवगुरुभूमिजै: सहितै:।।29।।

नृपसंमत: क्षताङ्गो नीचाचारो विगर्हितो मित्रै:।

भवति नरो विगतघृण: सुरेज्यकुजसौरिसंयोगे।।30।।

चारित्रविहीनाया: पुत्रो भर्ता भवेत्सुखविहीन:।

नित्यं प्रवासशील: संयुक्तै: सौरिकुजशुक्रै:।।31।।

सुतनु: क्षपितारिगणो नृपति: सुभगस्तथा (विपुदकीर्ति:)पृथुलकीर्ति:।

बुधगुरुशुक्रै: सहितैर्भवति नर: सत्यवचनश्च।।32।।

(मान)स्थानधनैश्वर्ययुतं प्राज्ञं बहुभोगिनं स्वदाररतम्।

धृतिसौख्यरतं(युतं) सुभगं जनयन्ति बुधार्किजीवाख्या:।।33।।

मुखरो धूर्तोऽनृतवाक् परयुवतिरतो भवेद्विषमशील:।

बुधशुक्रसूर्यतनयै: कलास्वभिज्ञ: स्वदेशरत:।।34।।

न्यूने कुलेऽपि जातो भवति नरो भूपतिर्विपुलकीर्ति:।

गुरुभार्गवदिनकरजैरेकस्थै: शीलसम्पन्न:।।35।।

पापैर्युक्ते चन्द्रे मातुरभाव: प्रकीर्तितप्राय:।

सूर्ये पितुस्तथान्यै: शुभं वदेन्मिश्रितैर्मिश्रम्।।36।।

प्राय: शुभा: समेता धनभूतियशोऽन्वितं(युतं) नृपतिचेष्टम्।

उत्पादयन्ति मनुजं भूमण्डलमण्डनं श्रेष्ठम्।।37।।

पापास्त्रयोपि मिलिता: कुर्वन्ति नरं सुदुर्भगं लोके।

दारिद्र्यदु:खतप्तं गर्हितरूपं विनयहीनम्।।38।।

इति कल्याणवर्मविरचितायां सारावल्यां त्रिग्रहयोगे नाम षोडशोऽध्याय: