यवनाचार्यैर्वृद्धैर्द्विग्रहयोगेषु यत्फलं प्रोक्तम्।
तदहमपहाय मत्सरमधुना वक्ष्ये विशेषेण।।1।।
युवतीनां वशग: स्यादविनीत: (कूटकृत् प्रलघुचित:)कूटवित्पृथुलवित्त:।
आसवविक्रयकुशलो रव्युडुपत्यो: क्रियानिपुण:।।2।।
ओजस्वी साहसिको मूर्खो बलसत्त्वसंयुतोऽनृतवाक्।
पापमतिर्वधनिरतो(निष्ठो) रविकुजयो: स्यात् प्रचण्डश्च।।3।।
सेवाकृदस्थिरधनो रविज्ञयो: प्रियवचा यशोर्थ: स्यात्।
आर्य: क्षितिपतिदयित: सतां च बलरूपवित्तविद्यावान्।।4।।
बहुधर्मो नृपसचिव: (सुबुद्धिमान्)समृद्धिमान्मित्रसंश्रयाप्तार्थ:।
सूर्ये बृहस्पतियुते भवेदुपाध्यायसंज्ञश्च।।5।।
शस्त्रप्रहरणविद्याशक्तियुतो नेत्रदुर्बलश्चरमे(चरभे)।
रङ्गज्ञो रविसितयो: स्त्रीसङ्गाल्लब्धबन्धुधन:(जन:)।।6।।
धातुज्ञो धर्ममय: (स्वकर्म)स्वधर्मनिरत: प्रणष्टसुतदार:।
निजवंशगुणै: (सिद्ध:)शुद्ध: शनिरव्योरल्पशीलश्च।।7।।
शूरो रणप्रतापी मल्लोऽसृग्वेदनार्तदेहश्च(वेदनाप्तदाह)।
मृच्चर्मधातुशिल्पी कूटज्ञश्चन्द्रकुजयोगे।।8।।
काव्यकथास्वतिनिपुण: सधन: स्त्रीसंमत: सुरूपश्च।
स्मितवदन: शशिबुधयोर्धर्मरुचि:(रति:) स्याद्विशिष्टगुण:।।9।।
दृढ़सौहृदो विनीत: स्वबन्धुसंमान(संमानकृद्धनेशश्च)वर्धनेशश्च।
गुर्विन्द्वो शुभशील: सुरद्विजेभ्यो (हितो)रतो भवेत्पुरुष:।।10।।
(धूपां)स्त्रग्धौताम्बरयुक्त: क्रियाविधिज्ञ: (कवि)कुलप्रियोऽत्यलस:।
क्रयविक्रयेषु कुशल: शशिभार्गवयो: सदा योगे।।11।।
जीर्ण(वधूनां)वधूजनरमणो गजाश्वसम्पादको(सम्पालको) विगतशील:।
वश्यो विधन: पुरुष: पराजित: स्याच्छशाङ्कशनियोगे।।12।।
स्त्रीदुर्भगोऽल्पवित्त: सुवर्णलोहप्रकारक: स्थपति:।
दुष्टस्त्रीविधवानां कुजबुधयोरौषधक्रियानिपुण:।।13।।
(शिल्पी)शिल्पश्रुतिशास्त्रज्ञो मेधावी वाग्वि शारदो मतिमान्।
अस्त्रप्रियप्रधान: सुरगुरुकुजो: (योगे)समागतयो:।।14।।
पूज्यो गणप्रधानो गणितज्ञ: परयुवतिभी(युवतिको) रतो धूर्त:।
द्यूतानृतशाठ्यरतो विटश्च(विट:सिते रुधिरसंयुते भवति) सितरुधिरसंयोगे।।15।।
धात्विन्द्रजालकुशल: (प्रपञ्चकस्तोयकर्म)प्रवञ्चकस्तेयकर्मकुशलश्च।
कुजसौरयोर्विधर्म: शत्रविषघ्न: कलिरुचि: स्यात्।।16।।
नृत्तविधेर्विज्ञाता प्राज्ञोऽपि च (वाद्य)गेयशास्त्रविन्मनुज:।
बुधगुरुयोगे मतिमान्सौख्ययुतो जायतेऽवश्यम्।।17।।
अतिशयधनो नयज्ञो बहुशिल्पो वेदवित्सुवाक्य: स्यात्।
गीतज्ञो हास्यरतिर्बुधसितयोर्गन्धमाल्यरुचि:।।18।।
(गुणवान्)ऋणवान् (डम्भ)दम्भप्राय: प्रपञ्चक: सत्कविर्गमनशील:।
निपुण: शोभनवाक्योक बुधशनियोगे पुमान् भवति।।19।।
जीवति (वेदै)विद्यावादैर्विशिष्टधर्मस्थित: प्रमाणयुत:।
जीवसितयोर्मनुष्यो विशिष्टदारो भवेन्मतिमान्(भवेद्धनवान्)।।20।।
शूरो वित्तसमृद्धो (नगराधिपति: सुखी यशस्वी च)नगराधिपतिर्यशस्वी च।
शनिजीवयो: प्रधान: श्रेणिसभाग्रामसंघानाम्।।21।।
दारुविदारणदक्ष: क्षुरचित्राश्मादिकर्मशिल्पो च।
मल्लोऽटन: पशुपति : शनिसितयोगे पुमान भवति।।22।।
उक्तं फलं गगनगा यद्यन्योन्यगणस्थिता:।
अधमादिविकल्पेन कुर्वन्ति विकृतिं तथा (इस अध्याय में उक्त श्लोकों के भाव देखें जातक पारिजात अध्याय 7)।।23।।
इति कल्पयाणवर्मवि रचितायां सारावल्यां द्विग्रहयोगो नाम पञ्चदशोध्याय: