दो शब्द

कल्याणवर्म विरचित सारावली ग्रन्थ ज्योतिष शास्त्र का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो ज्योतिष के त्रिस्कन्ध में से होरा स्कन्ध के अन्तर्गत आता है।

ग्रन्थकार ने अपने जन्म स्थान एवं ग्रन्थ रचनाकाल के विषय में स्पष्ट रूप में कुछ भी निर्देशित नहीं किया है, परन्तु कुछ श्लोकों के आधार पर पता चलता है कि देवग्राम नगर निवासी श्रीमद् व्याघ्रपदीश्वर कल्याणवर्मा इस प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता हैं। अतः व्याघ्रपदीश्वर शब्द से ग्रन्थकार बघेल वंशीय सिद्ध होते हैं।

इस ग्रन्थ में कुल 54 अध्याय हैं, जिनमें फलित ज्योतिष से जुड़े मूलभूत तत्त्वों का उल्लेख छन्दोबद्ध तरीके से अत्यन्त सरलतया किया गया है । वस्तुतः ज्योतिष शास्त्र का मुख्य उद्देश्य शुभ-अशुभ फलों का प्रतिपादन ही है । इस ग्रन्थ में फलादेश में उपयोगी राजयोगादि का उल्लेख है, जिनकी सहायता से गणक सरलतापूर्वक फलादेश करने में समर्थ होते हैं । ग्रन्थ के शास्त्रावतार संज्ञक प्रथम अध्याय का आरम्भ ज्योतिष के अष्टादश प्रवर्तक आचार्यों में अग्रगण्य भगवान सूर्यनारायण की स्तुति से हुआ है , तत्पश्चात होराशब्दार्थचिन्तादि 53 अध्यायों में ग्रन्थ आबद्ध हैं। इन अध्यायों के आद्योपान्त पठन से होराशास्त्र से जुड़े सभी शङ्काओं का निवारण होना निश्चित है।

उपर्युक्त ग्रन्थ का E-text के रूप में सम्पादन से छात्रों एवं गवेषकों को कम्प्यूप्टर, स्मार्टफ़ोन या टेबलेट के माध्यम से पाठ्यसामग्री की सरलता से प्राप्ति होगी। किसी भी विषय को सरलता एवं शीघ्रता से खोजा जा सकेगा। इसे ऑडियो फाइल में आसानी से परिवर्तित किया जा सकेगा, जो प्रज्ञाचक्षु छात्रों एवं गवेषकों के लिए अत्यन्त लाभप्रद सिद्ध होगा।

प्रो. सर्वनारायण झा