कालिदास विरचित कालामृतम् दक्षिण भारतीय परम्परा का एक विशेष ग्रन्थ है, इनके दो भाग हैं- पूर्वकालामृतम् एवं उत्तरकालामृतम्। यद्यपि मुहूर्त विषयक अनेक मान्य ग्रन्थ प्रचलित हैं फिर भी सर्वाधिक प्रचलित ग्रन्थों में उत्तर भारत में रामदैवज्ञकृत मुहूर्त्तचिन्तामणि अधिक प्रसिद्ध है। रामदैवज्ञ का नाम रामाचार्य भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त मुहूर्त्तमार्त्तण्ड, ज्यौतिषरत्नमाला, ज्योतिर्विदाभरण, मुहूर्त्तगणपति आदि ग्रन्थ हैं। उपरिलिखित कालामृतम् (पूर्वकालामृतम् एवं उत्तरकामृतम्) ग्रन्थ भी इसी परम्परा का दक्षि(ण भारतीय ग्रन्थ है।
पूर्वकालामृतम् को सात बिन्दुओं में ग्रन्थकार ने विभाजित किया है, जिसमें प्रथम बिन्दु में तिथिवार नक्षत्रादि की संज्ञाओं के साथ-साथ गर्भाधान से कर्णवेध पर्यन्त संस्कारों का विवेचन किया गया है। द्वितीय बिन्दु में उपनयन एवं समावर्तन संस्कारों का विवेचन किया गया है। तृतीय बिन्दु में विवाह सम्बन्धी प्रश्न, विवाह में प्रशस्त एवं निषिद्ध कालों का निरूपण, मेलापक (अष्टकूटों का) वर्णन, तथा विवाह मुहूर्त्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख किया गया है ।
चतुर्थ बिन्दु में श्रावणी कर्म, क्षौर कर्म, छुरिका बन्धन, प्रथम वधू प्रवेश, नववस्त्राभूषण धारण आदि का विवेचन किया गया है। पञ्चम बिन्दु में यात्रा सम्बन्धी मुहूर्त्तों एवं यात्रानिवृत्ति के बाद पुनः गृह प्रवेश तथा शकुन आदि का विचार किया गया है। षष्ठ बिन्दु में वासयोग्य भूमिचयन से गृह निर्माण एवं प्रवेश पर्यन्त अनेक विषयों का उल्लेख है। सप्तम बिन्दु में अन्तिम संस्कार सम्बन्धी विषय, श्राद्धकाल निर्णय, देव प्रतिष्ठा, बीज स्थापन एवं वपन आदि से सम्बन्धित मुहूर्त्त हैं ।
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प्रो. सर्वनारायण झा