दो शब्द

फलदीपिका, मन्त्रेश्वर द्वारा रचित भारतीय ज्योतिष शास्त्र का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें २८ अध्याय तथा कुल ८६५ श्लोक हैं। इस कृति में जातक से सम्बन्धित विषयों पर एक नये दृष्टि कोण देखे जा सकते हैं, जो अन्य ग्रन्थों में इतने व्यवस्थिनत रूप में नहीं हैं।

ग्रन्थकर्ता श्री मन्त्रेश्वर का जन्म दक्षिण भारत के सुदूरवर्ती तिनेवेली जनपद के निम्बूदरीपाद ब्राह्मण कुल में हुआ था। सुकुन्तलाम्बा इनके कुलदेवता थे। इस ग्रन्थ के रचना काल कुछ विद्वान् १३वीं और कुछ १६वीं शताब्दी मानते हैं। इसके कुछ श्लोक वैद्यनाथ विरचित जातकपारिजात से साम्य रखते हैं। जातकपारिजात के रचयिता श्री वैद्यानाथ 15वीं शताब्दी में हुए। यदि मन्त्रेश्वर १३वीं शताब्दी में हुए तो फलदीपिका का प्रभाव जातक पारिजात पर है और यदि मन्त्रेश्वर १६वीं शताब्दी में हुए तो जातक पारिजात का फलदीपिका पर प्रभाव है।

मन्त्रेश्वर विरचित फलदीपिका के गोचरफल कथन कुछ अधिक तर्कपूर्ण/तथ्यात्मक हैं। भावफलकथन में भी मन्त्रेश्वर का वैशिष्ट्य दिखार्इ देता है। सर्वतोभद्र पर विशेष टिप्पणी दी गयी है जो गोचरफल कथन में विशेष उपयोगी है। तत्सम्बन्धी उदाहरण भी दिये गये हैं। साथ ही कालचक्र दशा का स्पष्टीकरण भी बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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प्रो. सर्वनारायण झा