दो शब्द

प्रस्तुत ग्रन्थ महाभास्करीयम् आचार्य भास्कर प्रथम द्वारा रचित है। इसके रचयिता भास्कर प्रथम सातवीं सदी के माने गए हैं। यह ग्रन्थ ‘आर्यभटीयम्’ ग्रन्थ के मूल सिद्धान्तों के व्याख्या ग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इन्होंने आर्यभट की कृतियों पर टीका लिखी और उसी सन्दर्भ में ज्या य (sin x) का परिमेयमान बताया जो अनन्य एवं अत्यन्त उल्लेखनीय है। इस ग्रन्थ में कुल आठ अध्याय हैं। यह ग्रन्थ सिद्धान्त ज्योतिष एवं खगोल विज्ञान के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी माना जाता है। भास्कराचार्य प्रथम एक शिव भक्त ब्राह्मण थे। वृत्त्िम की दृष्टिि से एक शिक्षक थे, उससे उन्होंने बहुत ही अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित की थी। बाद में परिवती आचार्यों ने भास्कर प्रथम को श्रीमद्गुरूभास्कर के नाम से सम्बोधित करते थे। महाभास्करीय की टीका में शङ्करनारायण ने भास्कर प्रथम को श्रीमद्गुरूभास्कर कहकर सम्बोधित किया है।

भास्कर प्रथम के काल के विषय में कलियुग के 3730 वर्ष बीत जाने के बाद अर्थात् इसवी सन् 629 लगभग माना गया है। भास्कर प्रथम के दो ग्रन्थ महाभास्करीय और लघुभास्करीय उपलब्ध होते हैं जिसमें महाभास्करीय प्रथम रचना और लघुभास्करीय उसके बाद की रचना है, ऐसा प्रतीत होता है।

भास्कर प्रथम के जन्म स्थान के विषय में स्पष्ट जानकारी तो नहीं है, अन्त:साक्ष्य के आधार पर ये अष्मक या सौराष्ट्र के रहने वाले होंगे, ऐसा प्रतीत होता है। आर्यभट्टीय की टीका उन्होंने सौराष्ट्र के वल्लभी नामक स्थान पर रहकर लिखा, ऐसा लगता है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म अष्मक में हुआ था और वे वहाँ से वल्लभी चले गए। अष्मक खगोल विज्ञान अध्ययन का एक प्रधान केन्द्र रहा होगा, यह भी प्रतीत होता है। अष्मक एक देश विशेष का नाम था या जनपद यह स्पष्ट नहीं हो पया है। अष्मक पश्चिमोत्तर भारत का स्थान था या नर्मदा और गोदवरी के मध्य का स्थान था यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। भास्कर प्रथम द्वारा की गयी आर्यभट्टीय की टीका उनकी महत्वपू्र्ण कृतियों में से एक है। उन्हें सर्वज्ञ भास्कर भी कहा जाता रहा।

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प्रो. सर्वनारायण झा