प्रस्तुत ग्रन्थ लघुभास्करीयम् आचार्य भास्कर प्रथम द्वारा रचित है। इसके रचयिता भास्कर प्रथम सातवीं सदी के माने गए हैं। यह ग्रन्थ ‘आर्यभटीयम्’ ग्रन्थ के मूल सिद्धान्तों के व्याख्या ग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस ग्रन्थ में कुल आठ अध्याय हैं। लघुभास्करीयम् ग्रन्थ की विषय सामग्री के उद्धरण 16वीं शताब्दी तक सूर्यदेव (1191 ई.), यल्लाचार्य (1480 ई.), नीलकण्ठ (1500 ई.) आदि ने ग्रहगणित सम्बन्धित सिद्धान्त ग्रन्थों की व्याख्या में उद्धृत किये हैं लघुभास्करीयम्। इनके अतिरिक्त आपस्तम्बशुल्वसूत्र, तन्त्रसड्ग्रह आदि ग्रन्थों में भी इस ग्रन्थ के उद्धरण प्राप्त होते हैं। यह ग्रन्थ सिद्धान्त ज्योतिष एवं खगोल विज्ञान के विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी माना जाता है।
भास्कर प्रथम के काल के विषय में कलियुग के 3730 वर्ष बीत जाने के बाद अर्थात् इसवी सन् 629 लगभग माना गया है। भास्कर प्रथम के दो ग्रन्थ महाभास्करीय और लघुभास्करीय उपलब्ध होते हैं जिसमें महाभास्करीय प्रथम रचना और लघुभास्करीय उसके बाद की रचना है, ऐसा प्रतीत होता है।
भास्कर प्रथम के जन्म स्थान के विषय में स्पष्ट जानकारी तो नहीं है, अन्त:साक्ष्य के आधार पर ये अष्मक या सौराष्ट्र के रहने वाले होंगे, ऐसा प्रतीत होता है। आर्यभट्टीय की टीका उन्होंने सौराष्ट्र के वल्लभी नामक स्थान पर रहकर लिखा, ऐसा लगता है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका जन्म अष्मक में हुआ था और वे वहाँ से वल्लभी चले गए। अष्मक खगोल विज्ञान अध्ययन का एक प्रधान केन्द्र रहा होगा, यह भी प्रतीत होता है। अष्मक एक देश विशेष का नाम था या जनपद यह स्पष्ट नहीं हो पया है। अष्मक पश्चिमोत्तर भारत का स्थान था या नर्मदा और गोदवरी के मध्य का स्थान था यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है। भास्कर प्रथम द्वारा की गयी आर्यभट्टीय की टीका उनकी महत्वपू्र्ण कृतियों में से एक है। उन्हें सर्वज्ञ भास्कर भी कहा जाता रहा।
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प्रो. सर्वनारायण झा