वेदाङ्ग ज्योतिष के रूप में ऋग् एवं याजुषज्योतिष के साथ-साथ अथर्वज्योतिष का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें त्रिस्कन्ध ज्योतिष के मौलिक बिन्दु बीज रूप में सन्निहित हैं ऐसा कहा जा सकता है।
होरास्कन्ध की जातक शाखा के अन्तर्गत नक्षत्राधारित कुछ विषयों को स्पर्श करते हुए यह ग्रन्थ सिद्धन्त और संहिता स्कन्धों का भी सामान्य रूप से स्पर्श करता है। अतः त्रिस्कन्ध ज्योतिष के प्रतिनिधि के रूप में यह ग्रन्थ वेदाङ्ग ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण भाग है। काश्यप प्रजापति संवाद रूप यद्यपि यह ग्रन्थ प्रतिपाद्य और स्वरूप की दृष्टि से आर्ष ग्रन्थ तो है लेकिन अधिक प्राचीन प्रतीत नहीं होता है। कुछ स्थलों पर प्राप्त आर्ष प्रयोग और ज्योतिषशास्त्र सम्मत अभिनव वैदिक प्रयोग आदि के रूप में इसकी प्रामाणिकता मानी जा सकती है।
अथर्वज्योतिष का प्रस्तुत ई-संस्करण मूल रूप में पीताम्बर पीठ, दतिया, मध्यप्रदेश के सन् 1965 में प्रकाशित संस्करण को आदर्श मानकर किया गया है। कैसलॉगस कैटलोगोरम के अनुसार भाण्डाकर रिसर्च इंस्टीट्यूट, पूणे में संरक्षित इस ग्रन्थ की पाण्डुलिपि का सर्वप्रथम प्रकाशन 1928 ईस्वी में पंजाब संस्कृत सीरिज-6 में हुआ था। इस संस्करण को आम लोगों के लिए ई-कण्टेण्ट के रूप में टैगिंग कर उपलब्ध कराने का प्रयास किया है। आने वाले दिनों में इसका अंग्रेजी अनुवाद सहित ई-कण्टेण्ट उपलब्ध कराने का संकल्प है। इनके पाठ में कहीं-कहीं विसंगति लगी है। जिसे यथासम्भव शुद्ध कर लिया गया है। यद्यपि तीनों ही वेदाङ्ग ज्योतिष के ग्रन्थों के पाठ को शुद्ध करना एक कठिन कार्य है फिर भी यथासम्भव इसे करने का प्रयास किया गया है। इन तीनों का ही एक सम्मिलित रूप ई-कण्टेण्ट के रूप में यथाशीघ्र उपलब्ध कराने का संकल्प है।
प्रो. सर्वनारायण झा